Month: December 2015

वो मुक़द्दर का सिकंदर जानेमन कहलाएगा

रोते हुए आते है न सब हंसता हुआ जो जाएगा वो मुक़द्दर का सिकंदर जानेमन कहलाएगा वो सिकंदर क्या था ज़िसने ज़ुल्म से जीता ज़हां प्यार से जीते दिलो …

फ़सादात /रात पश्मीने की / गुलज़ार

उफुक फलांग के उमरा हुजूम लोगों का कोई मीनारे से उतरा, कोई मुंडेरों से किसी ने सीढियां लपकीं, हटाई दीवारें– कोई अजाँ से उठा है, कोई जरस सुन कर! …

आज मानव का सुनहला प्रात है

आज मानव का सुनहला प्रात है, आज विस्मृत का मृदुल आघात है; आज अलसित और मादकता-भरे, सुखद सपनों से शिथिल यह गात है; मानिनी हँसकर हृदय को खोल दो, …

वक्त / रात पश्मीने की / गुलज़ार

मैं उड़ते हुए पंछियों को डराता हुआ कुचलता हुआ घास की कलगियाँ गिराता हुआ गर्दनें इन दरख्तों की,छुपता हुआ जिनके पीछे से निकला चला जा रहा था वह सूरज …

अब के तजदीद-ए-वफ़ा का नहीं इमकान जानां / अहमद फ़राज़

अब के तजदीद-ए-वफ़ा का नहीं इमकान जानां याद क्या तुझ को दिलाएं तेरा पैमां जानां ab ke tajdiid-e-vafaa kaa nahii.n imkaa.N jaanaa.N yaad kyaa tujh ko dilaaye.N teraa paimaa.N …