Category: Dalit Poetry

सच / रामभरत पासी

भूख की बगल में दबी-छटपटाती आत्मा को धीरे-धीरे शरीर से अलग होते देखा है कभी? या देखा है उन्हें भी जो गढ़ते हैं शकुनि के पाँसे— निर्विकार भाव से …

समानान्तर इतिहास / नीरा परमार

इतिहास राजपथ का होता है पगडंडियों का नहीं! सभ्यताएँ / बनती हैं इतिहास और सभ्य / इतिहास पुरुष! समय उस बेनाम क़दमों का क़ायल नहीं जो अनजान दर्रों जंगलों …

सलाह / निशांत

वह हरिजन था उसने मन्दिर में प्रवेश करने की कोशिश की और तुमने उसे क़त्ल कर दिया वैसे इसकी ज़रा भी ज़रुरत नहीं थी तुम उसे विज्ञान और नये …

सिंहावलोकन / लक्ष्मी नारायण सुधाकर

वध करने ‘शम्बूक’ तुम्हारा फिर से राम चला है सावधान! ‘बलि’ भारत में युग-युग से गया छला है दम्भी-छल-कपटी द्विजाचार अब तक वह शत्रु हमारा ‘एकलव्य’ अँगूठा काट रहा …

सियासत / सी.बी. भारती

परम्परागत-कलुषित निहित स्वार्थवश निर्मित मकड़जाल तुम्हारी शक्ति और धर्म का अवलम्ब से बढ़ता रहा अन्धविश्वासों का आश्रय ले उसकी शक्ति पली-पुसी बढ़ी शोषण का एक नायाब तरीक़ा चलता रहा …

सिसकता आत्मसम्मान / सी.बी. भारती

(1) स्वतन्त्रता के अधूरे एहसास से धूमिल आत्मसम्मान के व्यथित क्षणों में ठहर-ठहर कर स्मृतियों के दंश घावों को हरा कर देते हैं याद आती है पगडंडियों पर से …

उगते अंकुर की तरह जियो / सुशीला टाकभौरे

स्वयं को पहचानो चक्की में पिसते अन्न की तरह नहीं उगते अंकुर की तरह जियो धरती और आकाश सबका है हवा प्रकाश किसके वश का है फिर इन सब …

आज़ाद हुआ बस लाल क़िला / लक्ष्मी नारायण सुधाकर

सामन्तों-पूँजीपतियों की जो मिली-भगत से काम हुआ सत्ता-परिवर्तन का सौदा करने पर क़त्ले-आम हुआ हिंसा-नफ़रत पर रखी गयी आज़ादी की आधारशिला आज़ाद हुआ बस लाल क़िला दो-चार वसन्त के …

आज का रैदास / जयप्रकाश कर्दम

शहर में कॉलोनी कॉलोनी में पार्क पार्क के कोने पर सड़क के किनारे जूती गाँठता रैदास पास में बैठा उसका आठ बरस का बेटा पूसन फटे-पुराने कपड़ों में लिपटा …

अभिलाषा / एन. आर. सागर

हाँ-हाँ मैं नकारता हूँ ईश्वर के अस्तित्व को संसार के मूल में उसके कृतित्व को विकास-प्रक्रिया में उसके स्वत्व को प्रकृति के संचरण नियम में उसके वर्चस्व को, क्योंकि …