Dalit Poetry

अखाड़े की माटी / ओमप्रकाश वाल्‍मीकि

Uzzal Das cleans a undergroud swerege drainage canal. Like Uzzal Das about 3.5 million “untouchable” sweepers have been staying all over Bangladesh from the British colonial period. Their job remains same till today, they perform the ‘unclean work’ such as cremate the dead, clean latrines, remove the dead animals from the road, sweep the gutters etc.

कुश्ती कोई भी लड़े
ढोल बजाता है सिमरू ही
जिसके सधे हाथ
भर देते हैं जोश पूरे दंगल में
उछलने लगती है मिट्टी पूरे अखाड़े की
ताक धिना-धिन… ताक धिना-धिन
झाँकने लगते हैं लोग
एक-दूसरे के कन्धों के ऊपर से
उचक-उचक कर

बहुत गहरा है रिश्ता
सिमरू और ढोल का—
जैसे साँस और धड़कन का

ढोल ख़ामोश है
तो ख़ामोश है
अखाड़े की माटी

ख़ामोश ढोल को
जगाएँगे हाथ सिमरू के
ढोल बजेगा
जागेगा अखाड़ा
जागेगी माटी अखाड़े की
माटी ही तो है
जो स्वीकारती है सभी को
अच्छे हों या बुरे
हर रूप में!!

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