सुनो द्रोपदी शस्त्र उठालो, अब गोविंद ना आयेंगे|

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जब जयशंकर प्रसाद कहते है –

नारी! तुम केवल श्रद्धा हो विश्वास-रजत-नग पगतल में,
पीयूष-स्रोत बहा करो जीवन के सुंदर समतल में।

तो नारी का एक भारतीय संस्करण आंखो के सामने खींच जाता है, जिसमें वह हमेशा पुरुष पर निर्भर रहती है; चाहे वह भौतिक सुख-सुविधाओं के लिए हो या फिर सुरक्षा के लिए| हर कदम पर भारतीय नारी को पराधीन रहना पड़ता है|

रामचरितमानस में तुलसीदासजी ने एक जगह लिखा है, “जिमि स्वतंत्र भई, बिगड़हि नारी” तो दुसरी तरफ़ नारी की दयनीय दशा पर शोक भी व्यक्त किया है – “पराधीन सपनेहुं सुख नाहिं”| भारतीय नारी की स्वतंत्रता की बात कभी भी साफ़ तरीके से नहीं की गई| हमेशा उसे रुप, सतीत्व आदि के जाल में फंसाकर रखा गया है| इस मानसिकता की एक झलक प्रेमचंद के महाकाव्यात्मक उपन्यास “गोदान” में भी मिलती है, जब उपन्यास का नायक होरी कहता है –
“औरत को भगवान सब कुछ दे, रूप न दे, नहीं तो वह काबू में नहीं रहती”| इसी संदर्भ में पुष्यमित्र उपाध्याय के द्वारा लिखी एक कविता आपके सामने प्रस्तुत है|

सुनो द्रोपदी शस्त्र उठालो, अब गोविंद ना आयेंगे|

छोडो मेहँदी खडक संभालो
खुद ही अपना चीर बचा लो
द्यूत बिछाये बैठे शकुनि,
मस्तक सब बिक जायेंगे
सुनो द्रोपदी शस्त्र उठालो, अब गोविंद ना आयेंगे|

कब तक आस लगाओगी तुम,
बिक़े हुए अखबारों से,
कैसी रक्षा मांग रही हो
दुशासन दरबारों से|

स्वयं जो लज्जा हीन पड़े हैं
वे क्या लाज बचायेंगे
सुनो द्रोपदी शस्त्र उठालो अब गोविंद ना आयंगे|

कल तक केवल अँधा राजा,
अब गूंगा बहरा भी है
होठ सी दिए हैं जनता के,
कानों पर पहरा भी है|

तुम ही कहो ये अश्रु तुम्हारे,
किसको क्या समझायेंगे?
सुनो द्रोपदी शस्त्र उठालो, अब गोविंद ना आयंगे|

-पुष्यमित्र उपाध्याय

अगर आप भी इस मानसिकता को बदलना चाहते है, तो इस कविता को अधिक से अधिक लोगो तक पहुंचाये|