Guru Nanak Dev JiPunjabi Poetry

Salok Guru Nanak Dev Ji in Hindi

सलोक गुरू नानक देव जी

1. कुदरति करि कै वसिआ सोइ

कुदरति करि कै वसिआ सोइ ॥
वखतु वीचारे सु बंदा होइ ॥
कुदरति है कीमति नही पाइ ॥
जा कीमति पाइ त कही न जाइ ॥
सरै सरीअति करहि बीचारु ॥
बिनु बूझे कैसे पावहि पारु ॥
सिदकु करि सिजदा मनु करि मखसूदु ॥
जिह धिरि देखा तिह धिरि मउजूदु ॥१॥(83)॥

2. गलीं असी चंगीआ आचारी बुरीआह

गलीं असी चंगीआ आचारी बुरीआह ॥
मनहु कुसुधा कालीआ बाहरि चिटवीआह ॥
रीसा करिह तिनाड़ीआ जो सेवहि दरु खड़ीआह ॥
नालि खसमै रतीआ माणहि सुखि रलीआह ॥
होदै ताणि निताणीआ रहहि निमानणीआह ॥
नानक जनमु सकारथा जे तिन कै संगि मिलाह ॥२॥(85)॥

3. पहिलै पिआरि लगा थण दुधि

पहिलै पिआरि लगा थण दुधि ॥
दूजै माइ बाप की सुधि ॥
तीजै भया भाभी बेब ॥
चउथै पिआरि उपंनी खेड ॥
पंजवै खाण पीअण की धातु ॥
छिवै कामु न पुछै जाति ॥
सतवै संजि कीआ घर वासु ॥
अठवै क्रोधु होआ तन नासु ॥
नावै धउले उभे साह ॥
दसवै दधा होआ सुआह ॥
गए सिगीत पुकारी धाह ॥
उडिआ हंसु दसाए राह ॥
आइआ गइआ मुइआ नाउ ॥
पिछै पतलि सदिहु काव ॥
नानक मनमुखि अंधु पिआरु ॥
बाझु गुरू डुबा संसारु ॥२॥(137)॥

4. दस बालतणि बीस रवणि तीसा का सुंदरु कहावै

दस बालतणि बीस रवणि तीसा का सुंदरु कहावै ॥
चालीसी पुरु होइ पचासी पगु खिसै सठी के बोढेपा आवै ॥
सतरि का मतिहीणु असीहां का विउहारु न पावै ॥
नवै का सिहजासणी मूलि न जाणै अप बलु ॥
ढंढोलिमु ढूढिमु डिठु मै नानक जगु धूए का धवलहरु ॥३॥(138)॥

5. कूड़ु बोलि मुरदारु खाइ

कूड़ु बोलि मुरदारु खाइ ॥
अवरी नो समझावणि जाइ ॥
मुठा आपि मुहाए साथै ॥
नानक ऐसा आगू जापै ॥१॥(139)

6. जे रतु लगै कपड़ै जामा होइ पलीतु

जे रतु लगै कपड़ै जामा होइ पलीतु ॥
जो रतु पीवहि माणसा तिन किउ निरमलु चीतु ॥
नानक नाउ खुदाइ का दिलि हछै मुखि लेहु ॥
अवरि दिवाजे दुनी के झूठे अमल करेहु ॥१॥(140)॥

7. जा हउ नाही ता किआ आखा किहु नाही किआ होवा

जा हउ नाही ता किआ आखा किहु नाही किआ होवा ॥
कीता करणा कहिआ कथना भरिआ भरि भरि धोवां ॥
आपि न बुझा लोक बुझाई ऐसा आगू होवां ॥
नानक अंधा होइ कै दसे राहै सभसु मुहाए साथै ॥
अगै गइआ मुहे मुहि पाहि सु ऐसा आगू जापै ॥२॥(140)॥

8. मिहर मसीति सिदकु मुसला हकु हलालु कुराणु

मिहर मसीति सिदकु मुसला हकु हलालु कुराणु ॥
सरम सुंनति सीलु रोजा होहु मुसलमाणु ॥
करणी काबा सचु पीरु कलमा करम निवाज ॥
तसबी सा तिसु भावसी नानक रखै लाज ॥१॥(140)

9. हकु पराइआ नानका उसु सूअर उसु गाइ

हकु पराइआ नानका उसु सूअर उसु गाइ ॥
गुरु पीरु हामा ता भरे जा मुरदारु न खाइ ॥
गली भिसति न जाईऐ छुटै सचु कमाइ ॥
मारण पाहि हराम महि होइ हलालु न जाइ ॥
नानक गली कूड़ीई कूड़ो पलै पाइ ॥२॥(141)॥

10. पंजि निवाजा वखत पंजि पंजा पंजे नाउ

पंजि निवाजा वखत पंजि पंजा पंजे नाउ ॥
पहिला सचु हलाल दुइ तीजा खैर खुदाइ ॥
चउथी नीअति रासि मनु पंजवी सिफति सनाइ ॥
करणी कलमा आखि कै ता मुसलमाणु सदाइ ॥
नानक जेते कूड़िआर कूड़ै कूड़ी पाइ ॥३॥(141)॥

11. मुसलमाणु कहावणु मुसकलु जा होइ ता मुसलमाणु कहावै

मुसलमाणु कहावणु मुसकलु जा होइ ता मुसलमाणु कहावै ॥
अवलि अउलि दीनु करि मिठा मसकल माना मालु मुसावै ॥
होइ मुसलिमु दीन मुहाणै मरण जीवण का भरमु चुकावै ॥
रब की रजाइ मंने सिर उपरि करता मंने आपु गवावै ॥
तउ नानक सरब जीआ मिहरमति होइ त मुसलमाणु कहावै ॥१॥(141)॥

12. नदीआ होवहि धेणवा सुम होवहि दुधु घीउ

नदीआ होवहि धेणवा सुम होवहि दुधु घीउ ॥
सगली धरती सकर होवै खुसी करे नित जीउ ॥
परबतु सुइना रुपा होवै हीरे लाल जड़ाउ ॥
भी तूंहै सालाहणा आखण लहै न चाउ ॥१॥
मः १ ॥
भार अठारह मेवा होवै गरुड़ा होइ सुआउ ॥
चंदु सूरजु दुइ फिरदे रखीअहि निहचलु होवै थाउ ॥
भी तूंहै सालाहणा आखण लहै न चाउ ॥२॥
मः १ ॥
जे देहै दुखु लाईऐ पाप गरह दुइ राहु ॥
रतु पीणे राजे सिरै उपरि रखीअहि एवै जापै भाउ ॥
भी तूंहै सालाहणा आखण लहै न चाउ ॥३॥
मः १ ॥
अगी पाला कपड़ु होवै खाणा होवै वाउ ॥
सुरगै दीआ मोहणीआ इसतरीआ होवनि नानक सभो जाउ ॥
भी तूहै सालाहणा आखण लहै न चाउ ॥४॥141॥

13. सो जीविआ जिसु मनि वसिआ सोइ

सो जीविआ जिसु मनि वसिआ सोइ ॥
नानक अवरु न जीवै कोइ ॥
जे जीवै पति लथी जाइ ॥
सभु हरामु जेता किछु खाइ ॥
राजि रंगु मालि रंगु ॥
रंगि रता नचै नंगु ॥
नानक ठगिआ मुठा जाइ ॥
विणु नावै पति गइआ गवाइ ॥१॥142॥

14. किआ खाधै किआ पैधै होइ

किआ खाधै किआ पैधै होइ ॥
जा मनि नाही सचा सोइ ॥
किआ मेवा किआ घिउ गुड़ु मिठा किआ मैदा किआ मासु ॥
किआ कपड़ु किआ सेज सुखाली कीजहि भोग बिलास ॥
किआ लसकर किआ नेब खवासी आवै महली वासु ॥
नानक सचे नाम विणु सभे टोल विणासु ॥२॥(142)॥

15. मछी तारू किआ करे पंखी किआ आकासु

मछी तारू किआ करे पंखी किआ आकासु ॥
पथर पाला किआ करे खुसरे किआ घर वासु ॥
कुते चंदनु लाईऐ भी सो कुती धातु ॥
बोला जे समझाईऐ पड़ीअहि सिम्रिति पाठ ॥
अंधा चानणि रखीऐ दीवे बलहि पचास ॥
चउणे सुइना पाईऐ चुणि चुणि खावै घासु ॥
लोहा मारणि पाईऐ ढहै न होइ कपास ॥
नानक मूरख एहि गुण बोले सदा विणासु ॥१॥(143)॥

16. कैहा कंचनु तुटै सारु

कैहा कंचनु तुटै सारु ॥
अगनी गंढु पाए लोहारु ॥
गोरी सेती तुटै भतारु ॥
पुतीं गंढु पवै संसारि ॥
राजा मंगै दितै गंढु पाइ ॥
भुखिआ गंढु पवै जा खाइ ॥
काला गंढु नदीआ मीह झोल ॥
गंढु परीती मिठे बोल ॥
बेदा गंढु बोले सचु कोइ ॥
मुइआ गंढु नेकी सतु होइ ॥
एतु गंढि वरतै संसारु ॥
मूरख गंढु पवै मुहि मार ॥
नानकु आखै एहु बीचारु ॥
सिफती गंढु पवै दरबारि ॥२॥(143)॥

17. कलि काती राजे कासाई धरमु पंख करि उडरिआ

कलि काती राजे कासाई धरमु पंख करि उडरिआ ॥
कूड़ु अमावस सचु चंद्रमा दीसै नाही कह चड़िआ ॥
हउ भालि विकुंनी होई ॥
आधेरै राहु न कोई ॥
विचि हउमै करि दुखु रोई ॥
कहु नानक किनि बिधि गति होई ॥१॥(145)॥

18. सबाही सालाह जिनी धिआइआ इक मनि

सबाही सालाह जिनी धिआइआ इक मनि ॥
सेई पूरे साह वखतै उपरि लड़ि मुए ॥
दूजै बहुते राह मन कीआ मती खिंडीआ ॥
बहुतु पए असगाह गोते खाहि न निकलहि ॥
तीजै मुही गिराह भुख तिखा दुइ भउकीआ ॥
खाधा होइ सुआह भी खाणे सिउ दोसती ॥
चउथै आई ऊंघ अखी मीटि पवारि गइआ ॥
भी उठि रचिओनु वादु सै वर्हिआ की पिड़ बधी ॥
सभे वेला वखत सभि जे अठी भउ होइ ॥
नानक साहिबु मनि वसै सचा नावणु होइ ॥१॥(145)॥

19. सचे तेरे खंड सचे ब्रहमंड

सचे तेरे खंड सचे ब्रहमंड ॥
सचे तेरे लोअ सचे आकार ॥
सचे तेरे करणे सरब बीचार ॥
सचा तेरा अमरु सचा दीबाणु ॥
सचा तेरा हुकमु सचा फुरमाणु ॥
सचा तेरा करमु सचा नीसाणु ॥
सचे तुधु आखहि लख करोड़ि ॥
सचै सभि ताणि सचै सभि जोरि ॥
सची तेरी सिफति सची सालाह ॥
सची तेरी कुदरति सचे पातिसाह ॥
नानक सचु धिआइनि सचु ॥
जो मरि जमे सु कचु निकचु ॥१॥(463)॥

20. वडी वडिआई जा वडा नाउ

वडी वडिआई जा वडा नाउ ॥
वडी वडिआई जा सचु निआउ ॥
वडी वडिआई जा निहचल थाउ ॥
वडी वडिआई जाणै आलाउ ॥
वडी वडिआई बुझै सभि भाउ ॥
वडी वडिआई जा पुछि न दाति ॥
वडी वडिआई जा आपे आपि ॥
नानक कार न कथनी जाइ ॥
कीता करणा सरब रजाइ ॥२॥(463)॥

21. विसमादु नाद विसमादु वेद

विसमादु नाद विसमादु वेद ॥
विसमादु जीअ विसमादु भेद ॥
विसमादु रूप विसमादु रंग ॥
विसमादु नागे फिरहि जंत ॥
विसमादु पउणु विसमादु पाणी ॥
विसमादु अगनी खेडहि विडाणी ॥
विसमादु धरती विसमादु खाणी ॥
विसमादु सादि लगहि पराणी ॥
विसमादु संजोगु विसमादु विजोगु ॥
विसमादु भुख विसमादु भोगु ॥
विसमादु सिफति विसमादु सालाह ॥
विसमादु उझड़ विसमादु राह ॥
विसमादु नेड़ै विसमादु दूरि ॥
विसमादु देखै हाजरा हजूरि ॥
वेखि विडाणु रहिआ विसमादु ॥
नानक बुझणु पूरै भागि ॥१॥(463)॥

22. कुदरति दिसै कुदरति सुणीऐ कुदरति भउ सुख सारु

कुदरति दिसै कुदरति सुणीऐ कुदरति भउ सुख सारु ॥
कुदरति पाताली आकासी कुदरति सरब आकारु ॥
कुदरति वेद पुराण कतेबा कुदरति सरब वीचारु ॥
कुदरति खाणा पीणा पैन्हणु कुदरति सरब पिआरु ॥
कुदरति जाती जिनसी रंगी कुदरति जीअ जहान ॥
कुदरति नेकीआ कुदरति बदीआ कुदरति मानु अभिमानु ॥
कुदरति पउणु पाणी बैसंतरु कुदरति धरती खाकु ॥
सभ तेरी कुदरति तूं कादिरु करता पाकी नाई पाकु ॥
नानक हुकमै अंदरि वेखै वरतै ताको ताकु ॥२॥(464)॥

23. भै विचि पवणु वहै सदवाउ

भै विचि पवणु वहै सदवाउ ॥
भै विचि चलहि लख दरीआउ ॥
भै विचि अगनि कढै वेगारि ॥
भै विचि धरती दबी भारि ॥
भै विचि इंदु फिरै सिर भारि ॥
भै विचि राजा धरम दुआरु ॥
भै विचि सूरजु भै विचि चंदु ॥
कोह करोड़ी चलत न अंतु ॥
भै विचि सिध बुध सुर नाथ ॥
भै विचि आडाणे आकास ॥
भै विचि जोध महाबल सूर ॥
भै विचि आवहि जावहि पूर ॥
सगलिआ भउ लिखिआ सिरि लेखु ॥
नानक निरभउ निरंकारु सचु एकु ॥१॥(464)॥

24. नानक निरभउ निरंकारु होरि केते राम रवाल

नानक निरभउ निरंकारु होरि केते राम रवाल ॥
केतीआ कंन्ह कहाणीआ केते बेद बीचार ॥
केते नचहि मंगते गिड़ि मुड़ि पूरहि ताल ॥
बाजारी बाजार महि आइ कढहि बाजार ॥
गावहि राजे राणीआ बोलहि आल पताल ॥
लख टकिआ के मुंदड़े लख टकिआ के हार ॥
जितु तनि पाईअहि नानका से तन होवहि छार ॥
गिआनु न गलीई ढूढीऐ कथना करड़ा सारु ॥
करमि मिलै ता पाईऐ होर हिकमति हुकमु खुआरु ॥२॥(464)॥

25. घड़ीआ सभे गोपीआ पहर कंन्ह गोपाल

घड़ीआ सभे गोपीआ पहर कंन्ह गोपाल ॥
गहणे पउणु पाणी बैसंतरु चंदु सूरजु अवतार ॥
सगली धरती मालु धनु वरतणि सरब जंजाल ॥
नानक मुसै गिआन विहूणी खाइ गइआ जमकालु ॥१॥(465)॥

26. वाइनि चेले नचनि गुर

वाइनि चेले नचनि गुर ॥
पैर हलाइनि फेरन्हि सिर ॥
उडि उडि रावा झाटै पाइ ॥
वेखै लोकु हसै घरि जाइ ॥
रोटीआ कारणि पूरहि ताल ॥
आपु पछाड़हि धरती नालि ॥
गावनि गोपीआ गावनि कान्ह ॥
गावनि सीता राजे राम ॥
निरभउ निरंकारु सचु नामु ॥
जा का कीआ सगल जहानु ॥
सेवक सेवहि करमि चड़ाउ ॥
भिंनी रैणि जिन्हा मनि चाउ ॥
सिखी सिखिआ गुर वीचारि ॥
नदरी करमि लघाए पारि ॥
कोलू चरखा चकी चकु ॥
थल वारोले बहुतु अनंतु ॥
लाटू माधाणीआ अनगाह ॥
पंखी भउदीआ लैनि न साह ॥
सूऐ चाड़ि भवाईअहि जंत ॥
नानक भउदिआ गणत न अंत ॥
बंधन बंधि भवाए सोइ ॥
पइऐ किरति नचै सभु कोइ ॥
नचि नचि हसहि चलहि से रोइ ॥
उडि न जाही सिध न होहि ॥
नचणु कुदणु मन का चाउ ॥
नानक जिन्ह मनि भउ तिन्हा मनि भाउ ॥२॥(465)॥

27. मुसलमाना सिफति सरीअति पड़ि पड़ि करहि बीचारु

मुसलमाना सिफति सरीअति पड़ि पड़ि करहि बीचारु ॥
बंदे से जि पवहि विचि बंदी वेखण कउ दीदारु ॥
हिंदू सालाही सालाहनि दरसनि रूपि अपारु ॥
तीरथि नावहि अरचा पूजा अगर वासु बहकारु ॥
जोगी सुंनि धिआवन्हि जेते अलख नामु करतारु ॥
सूखम मूरति नामु निरंजन काइआ का आकारु ॥
सतीआ मनि संतोखु उपजै देणै कै वीचारि ॥
दे दे मंगहि सहसा गूणा सोभ करे संसारु ॥
चोरा जारा तै कूड़िआरा खाराबा वेकार ॥
इकि होदा खाइ चलहि ऐथाऊ तिना भि काई कार ॥
जलि थलि जीआ पुरीआ लोआ आकारा आकार ॥
ओइ जि आखहि सु तूंहै जाणहि तिना भि तेरी सार ॥
नानक भगता भुख सालाहणु सचु नामु आधारु ॥
सदा अनंदि रहहि दिनु राती गुणवंतिआ पा छारु ॥१॥(466)॥

28. मिटी मुसलमान की पेड़ै पई कुम्हिआर

मिटी मुसलमान की पेड़ै पई कुम्हिआर ॥
घड़ि भांडे इटा कीआ जलदी करे पुकार ॥
जलि जलि रोवै बपुड़ी झड़ि झड़ि पवहि अंगिआर ॥
नानक जिनि करतै कारणु कीआ सो जाणै करतारु ॥२॥(466)॥

29. हउ विचि आइआ हउ विचि गइआ

हउ विचि आइआ हउ विचि गइआ ॥
हउ विचि जमिआ हउ विचि मुआ ॥
हउ विचि दिता हउ विचि लइआ ॥
हउ विचि खटिआ हउ विचि गइआ ॥
हउ विचि सचिआरु कूड़िआरु ॥
हउ विचि पाप पुंन वीचारु ॥
हउ विचि नरकि सुरगि अवतारु ॥
हउ विचि हसै हउ विचि रोवै ॥
हउ विचि भरीऐ हउ विचि धोवै ॥
हउ विचि जाती जिनसी खोवै ॥
हउ विचि मूरखु हउ विचि सिआणा ॥
मोख मुकति की सार न जाणा ॥
हउ विचि माइआ हउ विचि छाइआ ॥
हउमै करि करि जंत उपाइआ ॥
हउमै बूझै ता दरु सूझै ॥
गिआन विहूणा कथि कथि लूझै ॥
नानक हुकमी लिखीऐ लेखु ॥
जेहा वेखहि तेहा वेखु ॥१॥(466)॥

30. पुरखां बिरखां तीरथां तटां मेघां खेतांह

पुरखां बिरखां तीरथां तटां मेघां खेतांह ॥
दीपां लोआं मंडलां खंडां वरभंडांह ॥
अंडज जेरज उतभुजां खाणी सेतजांह ॥
सो मिति जाणै नानका सरां मेरां जंताह ॥
नानक जंत उपाइ कै समाले सभनाह ॥
जिनि करतै करणा कीआ चिंता भि करणी ताह ॥
सो करता चिंता करे जिनि उपाइआ जगु ॥
तिसु जोहारी सुअसति तिसु तिसु दीबाणु अभगु ॥
नानक सचे नाम बिनु किआ टिका किआ तगु ॥१॥(467)॥

31. लख नेकीआ चंगिआईआ लख पुंना परवाणु

लख नेकीआ चंगिआईआ लख पुंना परवाणु ॥
लख तप उपरि तीरथां सहज जोग बेबाण ॥
लख सूरतण संगराम रण महि छुटहि पराण ॥
लख सुरती लख गिआन धिआन पड़ीअहि पाठ पुराण ॥
जिनि करतै करणा कीआ लिखिआ आवण जाणु ॥
नानक मती मिथिआ करमु सचा नीसाणु ॥२॥(467)॥

32. पड़ि पड़ि गडी लदीअहि पड़ि पड़ि भरीअहि साथ

पड़ि पड़ि गडी लदीअहि पड़ि पड़ि भरीअहि साथ ॥
पड़ि पड़ि बेड़ी पाईऐ पड़ि पड़ि गडीअहि खात ॥
पड़ीअहि जेते बरस बरस पड़ीअहि जेते मास ॥
पड़ीऐ जेती आरजा पड़ीअहि जेते सास ॥
नानक लेखै इक गल होरु हउमै झखणा झाख ॥१॥(467)॥

33. लिखि लिखि पड़िआ

लिखि लिखि पड़िआ ॥
तेता कड़िआ ॥
बहु तीरथ भविआ ॥
तेतो लविआ ॥
बहु भेख कीआ देही दुखु दीआ ॥
सहु वे जीआ अपणा कीआ ॥
अंनु न खाइआ सादु गवाइआ ॥
बहु दुखु पाइआ दूजा भाइआ ॥
बसत्र न पहिरै ॥
अहिनिसि कहरै ॥
मोनि विगूता ॥
किउ जागै गुर बिनु सूता ॥
पग उपेताणा ॥
अपणा कीआ कमाणा ॥
अलु मलु खाई सिरि छाई पाई ॥
मूरखि अंधै पति गवाई ॥
विणु नावै किछु थाइ न पाई ॥
रहै बेबाणी मड़ी मसाणी ॥
अंधु न जाणै फिरि पछुताणी ॥
सतिगुरु भेटे सो सुखु पाए ॥
हरि का नामु मंनि वसाए ॥
नानक नदरि करे सो पाए ॥
आस अंदेसे ते निहकेवलु हउमै सबदि जलाए ॥२॥(467)॥

34. कूड़ु राजा कूड़ु परजा कूड़ु सभु संसारु

कूड़ु राजा कूड़ु परजा कूड़ु सभु संसारु ॥
कूड़ु मंडप कूड़ु माड़ी कूड़ु बैसणहारु ॥
कूड़ु सुइना कूड़ु रुपा कूड़ु पैन्हणहारु ॥
कूड़ु काइआ कूड़ु कपड़ु कूड़ु रूपु अपारु ॥
कूड़ु मीआ कूड़ु बीबी खपि होए खारु ॥
कूड़ि कूड़ै नेहु लगा विसरिआ करतारु ॥
किसु नालि कीचै दोसती सभु जगु चलणहारु ॥
कूड़ु मिठा कूड़ु माखिउ कूड़ु डोबे पूरु ॥
नानकु वखाणै बेनती तुधु बाझु कूड़ो कूड़ु ॥१॥(468)॥

35. सचु ता परु जाणीऐ जा रिदै सचा होइ

सचु ता परु जाणीऐ जा रिदै सचा होइ ॥
कूड़ की मलु उतरै तनु करे हछा धोइ ॥
सचु ता परु जाणीऐ जा सचि धरे पिआरु ॥
नाउ सुणि मनु रहसीऐ ता पाए मोख दुआरु ॥
सचु ता परु जाणीऐ जा जुगति जाणै जीउ ॥
धरति काइआ साधि कै विचि देइ करता बीउ ॥
सचु ता परु जाणीऐ जा सिख सची लेइ ॥
दइआ जाणै जीअ की किछु पुंनु दानु करेइ ॥
सचु तां परु जाणीऐ जा आतम तीरथि करे निवासु ॥
सतिगुरू नो पुछि कै बहि रहै करे निवासु ॥
सचु सभना होइ दारू पाप कढै धोइ ॥
नानकु वखाणै बेनती जिन सचु पलै होइ ॥२॥(468)॥

36. सचि कालु कूड़ु वरतिआ कलि कालख बेताल

सचि कालु कूड़ु वरतिआ कलि कालख बेताल ॥
बीउ बीजि पति लै गए अब किउ उगवै दालि ॥
जे इकु होइ त उगवै रुती हू रुति होइ ॥
नानक पाहै बाहरा कोरै रंगु न सोइ ॥
भै विचि खु्मबि चड़ाईऐ सरमु पाहु तनि होइ ॥
नानक भगती जे रपै कूड़ै सोइ न कोइ ॥१॥
(468)॥

37. लबु पापु दुइ राजा महता कूड़ु होआ सिकदारु

लबु पापु दुइ राजा महता कूड़ु होआ सिकदारु ॥
कामु नेबु सदि पुछीऐ बहि बहि करे बीचारु ॥
अंधी रयति गिआन विहूणी भाहि भरे मुरदारु ॥
गिआनी नचहि वाजे वावहि रूप करहि सीगारु ॥
ऊचे कूकहि वादा गावहि जोधा का वीचारु ॥
मूरख पंडित हिकमति हुजति संजै करहि पिआरु ॥
धरमी धरमु करहि गावावहि मंगहि मोख दुआरु ॥
जती सदावहि जुगति न जाणहि छडि बहहि घर बारु ॥
सभु को पूरा आपे होवै घटि न कोई आखै ॥
पति परवाणा पिछै पाईऐ ता नानक तोलिआ जापै ॥२॥(468)॥

38. वदी सु वजगि नानका सचा वेखै सोइ

वदी सु वजगि नानका सचा वेखै सोइ ॥
सभनी छाला मारीआ करता करे सु होइ ॥
अगै जाति न जोरु है अगै जीउ नवे ॥
जिन की लेखै पति पवै चंगे सेई केइ ॥३॥(469)॥

39. दुखु दारू सुखु रोगु भइआ जा सुखु तामि न होई

दुखु दारू सुखु रोगु भइआ जा सुखु तामि न होई ॥
तूं करता करणा मै नाही जा हउ करी न होई ॥१॥
बलिहारी कुदरति वसिआ ॥
तेरा अंतु न जाई लखिआ ॥१॥ रहाउ ॥
जाति महि जोति जोति महि जाता अकल कला भरपूरि रहिआ ॥
तूं सचा साहिबु सिफति सुआल्हिउ जिनि कीती सो पारि पइआ ॥
कहु नानक करते कीआ बाता जो किछु करणा सु करि रहिआ ॥२॥(469)॥

40. नानक मेरु सरीर का इकु रथु इकु रथवाहु

नानक मेरु सरीर का इकु रथु इकु रथवाहु ॥
जुगु जुगु फेरि वटाईअहि गिआनी बुझहि ताहि ॥
सतजुगि रथु संतोख का धरमु अगै रथवाहु ॥
त्रेतै रथु जतै का जोरु अगै रथवाहु ॥
दुआपुरि रथु तपै का सतु अगै रथवाहु ॥
कलजुगि रथु अगनि का कूड़ु अगै रथवाहु ॥१॥(470)॥

41. सिमल रुखु सराइरा अति दीरघ अति मुचु

सिमल रुखु सराइरा अति दीरघ अति मुचु ॥
ओइ जि आवहि आस करि जाहि निरासे कितु ॥
फल फिके फुल बकबके कमि न आवहि पत ॥
मिठतु नीवी नानका गुण चंगिआईआ ततु ॥
सभु को निवै आप कउ पर कउ निवै न कोइ ॥
धरि ताराजू तोलीऐ निवै सु गउरा होइ ॥
अपराधी दूणा निवै जो हंता मिरगाहि ॥
सीसि निवाइऐ किआ थीऐ जा रिदै कुसुधे जाहि ॥१॥(470)॥

42. पड़ि पुसतक संधिआ बादं

पड़ि पुसतक संधिआ बादं ॥
सिल पूजसि बगुल समाधं ॥
मुखि झूठ बिभूखण सारं ॥
त्रैपाल तिहाल बिचारं ॥
गलि माला तिलकु लिलाटं ॥
दुइ धोती बसत्र कपाटं ॥
जे जाणसि ब्रहमं करमं ॥
सभि फोकट निसचउ करमं ॥
कहु नानक निहचउ धिआवै ॥
विणु सतिगुर वाट न पावै ॥२॥(470)॥

43. साम कहै सेत्मबरु सुआमी सच महि आछै साचि रहे

साम कहै सेत्मबरु सुआमी सच महि आछै साचि रहे ॥
सभु को सचि समावै ॥
रिगु कहै रहिआ भरपूरि ॥
राम नामु देवा महि सूरु ॥
नाइ लइऐ पराछत जाहि ॥
नानक तउ मोखंतरु पाहि ॥
जुज महि जोरि छली चंद्रावलि कान्ह क्रिसनु जादमु भइआ ॥
पारजातु गोपी लै आइआ बिंद्राबन महि रंगु कीआ ॥
कलि महि बेदु अथरबणु हूआ नाउ खुदाई अलहु भइआ ॥
नील बसत्र ले कपड़े पहिरे तुरक पठाणी अमलु कीआ ॥
चारे वेद होए सचिआर ॥
पड़हि गुणहि तिन्ह चार वीचार ॥
भाउ भगति करि नीचु सदाए ॥
तउ नानक मोखंतरु पाए ॥२॥(470)॥

44. दइआ कपाह संतोखु सूतु जतु गंढी सतु वटु

दइआ कपाह संतोखु सूतु जतु गंढी सतु वटु ॥
एहु जनेऊ जीअ का हई त पाडे घतु ॥
ना एहु तुटै न मलु लगै ना एहु जलै न जाइ ॥
धंनु सु माणस नानका जो गलि चले पाइ ॥
चउकड़ि मुलि अणाइआ बहि चउकै पाइआ ॥
सिखा कंनि चड़ाईआ गुरु ब्राहमणु थिआ ॥
ओहु मुआ ओहु झड़ि पइआ वेतगा गइआ ॥१॥
(471)॥

45. लख चोरीआ लख जारीआ लख कूड़ीआ लख गालि

लख चोरीआ लख जारीआ लख कूड़ीआ लख गालि ॥
लख ठगीआ पहिनामीआ राति दिनसु जीअ नालि ॥
तगु कपाहहु कतीऐ बाम्हणु वटे आइ ॥
कुहि बकरा रिंन्हि खाइआ सभु को आखै पाइ ॥
होइ पुराणा सुटीऐ भी फिरि पाईऐ होरु ॥
नानक तगु न तुटई जे तगि होवै जोरु ॥२॥
मः १ ॥
नाइ मंनिऐ पति ऊपजै सालाही सचु सूतु ॥
दरगह अंदरि पाईऐ तगु न तूटसि पूत ॥३॥(471)॥

46. तगु न इंद्री तगु न नारी

तगु न इंद्री तगु न नारी ॥
भलके थुक पवै नित दाड़ी ॥
तगु न पैरी तगु न हथी ॥
तगु न जिहवा तगु न अखी ॥
वेतगा आपे वतै ॥
वटि धागे अवरा घतै ॥
लै भाड़ि करे वीआहु ॥
कढि कागलु दसे राहु ॥
सुणि वेखहु लोका एहु विडाणु ॥
मनि अंधा नाउ सुजाणु ॥४॥(471)॥

47. गऊ बिराहमण कउ करु लावहु गोबरि तरणु न जाई

गऊ बिराहमण कउ करु लावहु गोबरि तरणु न जाई ॥
धोती टिका तै जपमाली धानु मलेछां खाई ॥
अंतरि पूजा पड़हि कतेबा संजमु तुरका भाई ॥
छोडीले पाखंडा ॥
नामि लइऐ जाहि तरंदा ॥१॥(471)॥

48. माणस खाणे करहि निवाज

माणस खाणे करहि निवाज ॥
छुरी वगाइनि तिन गलि ताग ॥
तिन घरि ब्रहमण पूरहि नाद ॥
उन्हा भि आवहि ओई साद ॥
कूड़ी रासि कूड़ा वापारु ॥
कूड़ु बोलि करहि आहारु ॥
सरम धरम का डेरा दूरि ॥
नानक कूड़ु रहिआ भरपूरि ॥
मथै टिका तेड़ि धोती कखाई ॥
हथि छुरी जगत कासाई ॥
नील वसत्र पहिरि होवहि परवाणु ॥
मलेछ धानु ले पूजहि पुराणु ॥
अभाखिआ का कुठा बकरा खाणा ॥
चउके उपरि किसै न जाणा ॥
दे कै चउका कढी कार ॥
उपरि आइ बैठे कूड़िआर ॥
मतु भिटै वे मतु भिटै ॥
इहु अंनु असाडा फिटै ॥
तनि फिटै फेड़ करेनि ॥
मनि जूठै चुली भरेनि ॥
कहु नानक सचु धिआईऐ ॥
सुचि होवै ता सचु पाईऐ ॥२॥(471)॥

49. जे मोहाका घरु मुहै घरु मुहि पितरी देइ

जे मोहाका घरु मुहै घरु मुहि पितरी देइ ॥
अगै वसतु सिञाणीऐ पितरी चोर करेइ ॥
वढीअहि हथ दलाल के मुसफी एह करेइ ॥
नानक अगै सो मिलै जि खटे घाले देइ ॥१॥(472)॥

50. जिउ जोरू सिरनावणी आवै वारो वार

जिउ जोरू सिरनावणी आवै वारो वार ॥
जूठे जूठा मुखि वसै नित नित होइ खुआरु ॥
सूचे एहि न आखीअहि बहनि जि पिंडा धोइ ॥
सूचे सेई नानका जिन मनि वसिआ सोइ ॥२॥(472)॥

51. जे करि सूतकु मंनीऐ सभ तै सूतकु होइ

जे करि सूतकु मंनीऐ सभ तै सूतकु होइ ॥
गोहे अतै लकड़ी अंदरि कीड़ा होइ ॥
जेते दाणे अंन के जीआ बाझु न कोइ ॥
पहिला पाणी जीउ है जितु हरिआ सभु कोइ ॥
सूतकु किउ करि रखीऐ सूतकु पवै रसोइ ॥
नानक सूतकु एव न उतरै गिआनु उतारे धोइ ॥१॥
मः १ ॥
मन का सूतकु लोभु है जिहवा सूतकु कूड़ु ॥
अखी सूतकु वेखणा पर त्रिअ पर धन रूपु ॥
कंनी सूतकु कंनि पै लाइतबारी खाहि ॥
नानक हंसा आदमी बधे जम पुरि जाहि ॥२॥
मः १ ॥
सभो सूतकु भरमु है दूजै लगै जाइ ॥
जमणु मरणा हुकमु है भाणै आवै जाइ ॥
खाणा पीणा पवित्रु है दितोनु रिजकु स्मबाहि ॥
नानक जिन्ही गुरमुखि बुझिआ तिन्हा सूतकु नाहि ॥३॥(472)॥

52. पहिला सुचा आपि होइ सुचै बैठा आइ

पहिला सुचा आपि होइ सुचै बैठा आइ ॥
सुचे अगै रखिओनु कोइ न भिटिओ जाइ ॥
सुचा होइ कै जेविआ लगा पड़णि सलोकु ॥
कुहथी जाई सटिआ किसु एहु लगा दोखु ॥
अंनु देवता पाणी देवता बैसंतरु देवता लूणु पंजवा पाइआ घिरतु ॥
ता होआ पाकु पवितु ॥
पापी सिउ तनु गडिआ थुका पईआ तितु ॥
जितु मुखि नामु न ऊचरहि बिनु नावै रस खाहि ॥
नानक एवै जाणीऐ तितु मुखि थुका पाहि ॥१॥(473)॥

53. भंडि जमीऐ भंडि निमीऐ भंडि मंगणु वीआहु

भंडि जमीऐ भंडि निमीऐ भंडि मंगणु वीआहु ॥
भंडहु होवै दोसती भंडहु चलै राहु ॥
भंडु मुआ भंडु भालीऐ भंडि होवै बंधानु ॥
सो किउ मंदा आखीऐ जितु जमहि राजान ॥
भंडहु ही भंडु ऊपजै भंडै बाझु न कोइ ॥
नानक भंडै बाहरा एको सचा सोइ ॥
जितु मुखि सदा सालाहीऐ भागा रती चारि ॥
नानक ते मुख ऊजले तितु सचै दरबारि ॥२॥(473)॥

54. नानक फिकै बोलिऐ तनु मनु फिका होइ

नानक फिकै बोलिऐ तनु मनु फिका होइ ॥
फिको फिका सदीऐ फिके फिकी सोइ ॥
फिका दरगह सटीऐ मुहि थुका फिके पाइ ॥
फिका मूरखु आखीऐ पाणा लहै सजाइ ॥१॥(473)॥

55. अंदरहु झूठे पैज बाहरि दुनीआ अंदरि फैलु

अंदरहु झूठे पैज बाहरि दुनीआ अंदरि फैलु ॥
अठसठि तीरथ जे नावहि उतरै नाही मैलु ॥
जिन्ह पटु अंदरि बाहरि गुदड़ु ते भले संसारि ॥
तिन्ह नेहु लगा रब सेती देखन्हे वीचारि ॥
रंगि हसहि रंगि रोवहि चुप भी करि जाहि ॥
परवाह नाही किसै केरी बाझु सचे नाह ॥
दरि वाट उपरि खरचु मंगा जबै देइ त खाहि ॥
दीबानु एको कलम एका हमा तुम्हा मेलु ॥
दरि लए लेखा पीड़ि छुटै नानका जिउ तेलु ॥२॥(473)॥

56. आपे भांडे साजिअनु आपे पूरणु देइ

आपे भांडे साजिअनु आपे पूरणु देइ ॥
इकन्ही दुधु समाईऐ इकि चुल्है रहन्हि चड़े ॥
इकि निहाली पै सवन्हि इकि उपरि रहनि खड़े ॥
तिन्हा सवारे नानका जिन्ह कउ नदरि करे ॥१॥(475)॥

57. हिंदू मूले भूले अखुटी जांही

हिंदू मूले भूले अखुटी जांही ॥
नारदि कहिआ सि पूज करांही ॥
अंधे गुंगे अंध अंधारु ॥
पाथरु ले पूजहि मुगध गवार ॥
ओहि जा आपि डुबे तुम कहा तरणहारु ॥२॥(556)॥

58. सोरठि सदा सुहावणी जे सचा मनि होइ

सोरठि सदा सुहावणी जे सचा मनि होइ ॥
दंदी मैलु न कतु मनि जीभै सचा सोइ ॥
ससुरै पेईऐ भै वसी सतिगुरु सेवि निसंग ॥
परहरि कपड़ु जे पिर मिलै खुसी रावै पिरु संगि ॥
सदा सीगारी नाउ मनि कदे न मैलु पतंगु ॥
देवर जेठ मुए दुखि ससू का डरु किसु ॥
जे पिर भावै नानका करम मणी सभु सचु ॥१॥(642)॥

59. नावण चले तीरथी मनि खोटै तनि चोर

नावण चले तीरथी मनि खोटै तनि चोर ॥
इकु भाउ लथी नातिआ दुइ भा चड़ीअसु होर ॥
बाहरि धोती तूमड़ी अंदरि विसु निकोर ॥
साध भले अणनातिआ चोर सि चोरा चोर ॥२॥(789)॥

60. सउ ओलाम्हे दिनै के राती मिलन्हि सहंस

सउ ओलाम्हे दिनै के राती मिलन्हि सहंस ॥
सिफति सलाहणु छडि कै करंगी लगा हंसु ॥
फिटु इवेहा जीविआ जितु खाइ वधाइआ पेटु ॥
नानक सचे नाम विणु सभो दुसमनु हेतु ॥२॥(790)॥

61. दीवा बलै अंधेरा जाइ

दीवा बलै अंधेरा जाइ ॥
बेद पाठ मति पापा खाइ ॥
उगवै सूरु न जापै चंदु ॥
जह गिआन प्रगासु अगिआनु मिटंतु ॥
बेद पाठ संसार की कार ॥
पड़्हि पड़्हि पंडित करहि बीचार ॥
बिनु बूझे सभ होइ खुआर ॥
नानक गुरमुखि उतरसि पारि ॥१॥
(791)॥

62. सती पापु करि सतु कमाहि

सती पापु करि सतु कमाहि ॥
गुर दीखिआ घरि देवण जाहि ॥
इसतरी पुरखै खटिऐ भाउ ॥
भावै आवउ भावै जाउ ॥
सासतु बेदु न मानै कोइ ॥
आपो आपै पूजा होइ ॥
काजी होइ कै बहै निआइ ॥
फेरे तसबी करे खुदाइ ॥
वढी लै कै हकु गवाए ॥
जे को पुछै ता पड़ि सुणाए ॥
तुरक मंत्रु कनि रिदै समाहि ॥
लोक मुहावहि चाड़ी खाहि ॥
चउका दे कै सुचा होइ ॥
ऐसा हिंदू वेखहु कोइ ॥
जोगी गिरही जटा बिभूत ॥
आगै पाछै रोवहि पूत ॥
जोगु न पाइआ जुगति गवाई ॥
कितु कारणि सिरि छाई पाई ॥
नानक कलि का एहु परवाणु ॥
आपे आखणु आपे जाणु ॥१॥(951)॥

63. हिंदू कै घरि हिंदू आवै

हिंदू कै घरि हिंदू आवै ॥
सूतु जनेऊ पड़ि गलि पावै ॥
सूतु पाइ करे बुरिआई ॥
नाता धोता थाइ न पाई ॥
मुसलमानु करे वडिआई ॥
विणु गुर पीरै को थाइ न पाई ॥
राहु दसाइ ओथै को जाइ ॥
करणी बाझहु भिसति न पाइ ॥
जोगी कै घरि जुगति दसाई ॥
तितु कारणि कनि मुंद्रा पाई ॥
मुंद्रा पाइ फिरै संसारि ॥
जिथै किथै सिरजणहारु ॥
जेते जीअ तेते वाटाऊ ॥
चीरी आई ढिल न काऊ ॥
एथै जाणै सु जाइ सिञाणै ॥
होरु फकड़ु हिंदू मुसलमाणै ॥
सभना का दरि लेखा होइ ॥
करणी बाझहु तरै न कोइ ॥
सचो सचु वखाणै कोइ ॥
नानक अगै पुछ न होइ ॥२॥(952)॥

64. ना सति दुखीआ ना सति सुखीआ ना सति पाणी जंत फिरहि

ना सति दुखीआ ना सति सुखीआ ना सति पाणी जंत फिरहि ॥
ना सति मूंड मुडाई केसी ना सति पड़िआ देस फिरहि ॥
ना सति रुखी बिरखी पथर आपु तछावहि दुख सहहि ॥
ना सति हसती बधे संगल ना सति गाई घाहु चरहि ॥
जिसु हथि सिधि देवै जे सोई जिस नो देइ तिसु आइ मिलै ॥
नानक ता कउ मिलै वडाई जिसु घट भीतरि सबदु रवै ॥
सभि घट मेरे हउ सभना अंदरि जिसहि खुआई तिसु कउणु कहै ॥
जिसहि दिखाला वाटड़ी तिसहि भुलावै कउणु ॥
जिसहि भुलाई पंध सिरि तिसहि दिखावै कउणु ॥१॥(952)॥

65. सो गिरही जो निग्रहु करै

सो गिरही जो निग्रहु करै ॥
जपु तपु संजमु भीखिआ करै ॥
पुंन दान का करे सरीरु ॥
सो गिरही गंगा का नीरु ॥
बोलै ईसरु सति सरूपु ॥
परम तंत महि रेख न रूपु ॥२॥(952)॥

66. सो अउधूती जो धूपै आपु

सो अउधूती जो धूपै आपु ॥
भिखिआ भोजनु करै संतापु ॥
अउहठ पटण महि भीखिआ करै ॥
सो अउधूती सिव पुरि चड़ै ॥
बोलै गोरखु सति सरूपु ॥
परम तंत महि रेख न रूपु ॥३॥(952)॥

67. सो उदासी जि पाले उदासु

सो उदासी जि पाले उदासु ॥
अरध उरध करे निरंजन वासु ॥
चंद सूरज की पाए गंढि ॥
तिसु उदासी का पड़ै न कंधु ॥
बोलै गोपी चंदु सति सरूपु ॥
परम तंत महि रेख न रूपु ॥४॥(952)॥

68. सो पाखंडी जि काइआ पखाले

सो पाखंडी जि काइआ पखाले ॥
काइआ की अगनि ब्रहमु परजाले ॥
सुपनै बिंदु न देई झरणा ॥
तिसु पाखंडी जरा न मरणा ॥
बोलै चरपटु सति सरूपु ॥
परम तंत महि रेख न रूपु ॥५॥(952)॥

69. सो बैरागी जि उलटे ब्रहमु

सो बैरागी जि उलटे ब्रहमु ॥
गगन मंडल महि रोपै थमु ॥
अहिनिसि अंतरि रहै धिआनि ॥
ते बैरागी सत समानि ॥
बोलै भरथरि सति सरूपु ॥
परम तंत महि रेख न रूपु ॥६॥(953)॥

70. किउ मरै मंदा किउ जीवै जुगति

किउ मरै मंदा किउ जीवै जुगति ॥
कंन पड़ाइ किआ खाजै भुगति ॥
आसति नासति एको नाउ ॥
कउणु सु अखरु जितु रहै हिआउ ॥
धूप छाव जे सम करि सहै ॥
ता नानकु आखै गुरु को कहै ॥
छिअ वरतारे वरतहि पूत ॥
ना संसारी ना अउधूत ॥
निरंकारि जो रहै समाइ ॥
काहे भीखिआ मंगणि जाइ ॥७॥(953)॥

71. नानकु आखै रे मना सुणीऐ सिख सही

नानकु आखै रे मना सुणीऐ सिख सही ॥
लेखा रबु मंगेसीआ बैठा कढि वही ॥
तलबा पउसनि आकीआ बाकी जिना रही ॥
अजराईलु फरेसता होसी आइ तई ॥
आवणु जाणु न सुझई भीड़ी गली फही ॥
कूड़ निखुटे नानका ओड़कि सचि रही ॥२॥(953)॥

72. सहंसर दान दे इंद्रु रोआइआ

सहंसर दान दे इंद्रु रोआइआ ॥
परस रामु रोवै घरि आइआ ॥
अजै सु रोवै भीखिआ खाइ ॥
ऐसी दरगह मिलै सजाइ ॥
रोवै रामु निकाला भइआ ॥
सीता लखमणु विछुड़ि गइआ ॥
रोवै दहसिरु लंक गवाइ ॥
जिनि सीता आदी डउरू वाइ ॥
रोवहि पांडव भए मजूर ॥
जिन कै सुआमी रहत हदूरि ॥
रोवै जनमेजा खुइ गइआ ॥
एकी कारणि पापी भइआ ॥
रोवहि सेख मसाइक पीर ॥
अंति कालि मतु लागै भीड़ ॥
रोवहि राजे कंन पड़ाइ ॥
घरि घरि मागहि भीखिआ जाइ ॥
रोवहि किरपन संचहि धनु जाइ ॥
पंडित रोवहि गिआनु गवाइ ॥
बाली रोवै नाहि भतारु ॥
नानक दुखीआ सभु संसारु ॥
मंने नाउ सोई जिणि जाइ ॥
अउरी करम न लेखै लाइ ॥१॥(953)॥

73. सावणु राति अहाड़ु दिहु कामु क्रोधु दुइ खेत

सावणु राति अहाड़ु दिहु कामु क्रोधु दुइ खेत ॥
लबु वत्र दरोगु बीउ हाली राहकु हेत ॥
हलु बीचारु विकार मण हुकमी खटे खाइ ॥
नानक लेखै मंगिऐ अउतु जणेदा जाइ ॥१॥(955)॥

74. भउ भुइ पवितु पाणी सतु संतोखु बलेद

भउ भुइ पवितु पाणी सतु संतोखु बलेद ॥
हलु हलेमी हाली चितु चेता वत्र वखत संजोगु ॥
नाउ बीजु बखसीस बोहल दुनीआ सगल दरोग ॥
नानक नदरी करमु होइ जावहि सगल विजोग ॥२॥(955)॥

75. नानक इहु जीउ मछुली झीवरु त्रिसना कालु

नानक इहु जीउ मछुली झीवरु त्रिसना कालु ॥
मनूआ अंधु न चेतई पड़ै अचिंता जालु ॥
नानक चितु अचेतु है चिंता बधा जाइ ॥
नदरि करे जे आपणी ता आपे लए मिलाइ ॥२॥(955)॥

76. वेलि पिंञाइआ कति वुणाइआ

वेलि पिंञाइआ कति वुणाइआ ॥
कटि कुटि करि खु्मबि चड़ाइआ ॥
लोहा वढे दरजी पाड़े सूई धागा सीवै ॥
इउ पति पाटी सिफती सीपै नानक जीवत जीवै ॥
होइ पुराणा कपड़ु पाटै सूई धागा गंढै ॥
माहु पखु किहु चलै नाही घड़ी मुहतु किछु हंढै ॥
सचु पुराणा होवै नाही सीता कदे न पाटै ॥
नानक साहिबु सचो सचा तिचरु जापी जापै ॥१॥(956)॥

77. सच की काती सचु सभु सारु

सच की काती सचु सभु सारु ॥
घाड़त तिस की अपर अपार ॥
सबदे साण रखाई लाइ ॥
गुण की थेकै विचि समाइ ॥
तिस दा कुठा होवै सेखु ॥
लोहू लबु निकथा वेखु ॥
होइ हलालु लगै हकि जाइ ॥
नानक दरि दीदारि समाइ ॥२॥(956)॥

78. कमरि कटारा बंकुड़ा बंके का असवारु

कमरि कटारा बंकुड़ा बंके का असवारु ॥
गरबु न कीजै नानका मतु सिरि आवै भारु ॥३॥(956)॥

79. सरवर हंस धुरे ही मेला खसमै एवै भाणा

सरवर हंस धुरे ही मेला खसमै एवै भाणा ॥
सरवर अंदरि हीरा मोती सो हंसा का खाणा ॥
बगुला कागु न रहई सरवरि जे होवै अति सिआणा ॥
ओना रिजकु न पइओ ओथै ओन्हा होरो खाणा ॥
सचि कमाणै सचो पाईऐ कूड़ै कूड़ा माणा ॥
नानक तिन कौ सतिगुरु मिलिआ जिना धुरे पैया परवाणा ॥१॥(956)॥

80. साहिबु मेरा उजला जे को चिति करेइ

साहिबु मेरा उजला जे को चिति करेइ ॥
नानक सोई सेवीऐ सदा सदा जो देइ ॥
नानक सोई सेवीऐ जितु सेविऐ दुखु जाइ ॥
अवगुण वंञनि गुण रवहि मनि सुखु वसै आइ ॥२॥(956)॥

81. विणु गाहक गुणु वेचीऐ तउ गुणु सहघो जाइ

विणु गाहक गुणु वेचीऐ तउ गुणु सहघो जाइ ॥
गुण का गाहकु जे मिलै तउ गुणु लाख विकाइ ॥
गुण ते गुण मिलि पाईऐ जे सतिगुर माहि समाइ ॥
मोलि अमोलु न पाईऐ वणजि न लीजै हाटि ॥
नानक पूरा तोलु है कबहु न होवै घाटि ॥१॥(1086)॥

82. हुकमि रजाई साखती दरगह सचु कबूलु

हुकमि रजाई साखती दरगह सचु कबूलु ॥
साहिबु लेखा मंगसी दुनीआ देखि न भूलु ॥
दिल दरवानी जो करे दरवेसी दिलु रासि ॥
इसक मुहबति नानका लेखा करते पासि ॥१॥(1090)॥

83. सुणीऐ एकु वखाणीऐ सुरगि मिरति पइआलि

सुणीऐ एकु वखाणीऐ सुरगि मिरति पइआलि ॥
हुकमु न जाई मेटिआ जो लिखिआ सो नालि ॥
कउणु मूआ कउणु मारसी कउणु आवै कउणु जाइ ॥
कउणु रहसी नानका किस की सुरति समाइ ॥१॥(1091)॥

84. हउ मुआ मै मारिआ पउणु वहै दरीआउ

हउ मुआ मै मारिआ पउणु वहै दरीआउ ॥
त्रिसना थकी नानका जा मनु रता नाइ ॥
लोइण रते लोइणी कंनी सुरति समाइ ॥
जीभ रसाइणि चूनड़ी रती लाल लवाइ ॥
अंदरु मुसकि झकोलिआ कीमति कही न जाइ ॥२॥(1091)॥

85. हउ मै करी तां तू नाही तू होवहि हउ नाहि

हउ मै करी तां तू नाही तू होवहि हउ नाहि ॥
बूझहु गिआनी बूझणा एह अकथ कथा मन माहि ॥
बिनु गुर ततु न पाईऐ अलखु वसै सभ माहि ॥
सतिगुरु मिलै त जाणीऐ जां सबदु वसै मन माहि ॥
आपु गइआ भ्रमु भउ गइआ जनम मरन दुख जाहि ॥
गुरमति अलखु लखाईऐ ऊतम मति तराहि ॥
नानक सोहं हंसा जपु जापहु त्रिभवण तिसै समाहि ॥१॥(1092)॥

86. न भीजै रागी नादी बेदि

न भीजै रागी नादी बेदि ॥
न भीजै सुरती गिआनी जोगि ॥
न भीजै सोगी कीतै रोजि ॥
न भीजै रूपीं मालीं रंगि ॥
न भीजै तीरथि भविऐ नंगि ॥
न भीजै दातीं कीतै पुंनि ॥
न भीजै बाहरि बैठिआ सुंनि ॥
न भीजै भेड़ि मरहि भिड़ि सूर ॥
न भीजै केते होवहि धूड़ ॥
लेखा लिखीऐ मन कै भाइ ॥
नानक भीजै साचै नाइ ॥२॥(1237)॥

87. नव छिअ खट का करे बीचारु

नव छिअ खट का करे बीचारु ॥
निसि दिन उचरै भार अठार ॥
तिनि भी अंतु न पाइआ तोहि ॥
नाम बिहूण मुकति किउ होइ ॥
नाभि वसत ब्रहमै अंतु न जाणिआ ॥
गुरमुखि नानक नामु पछाणिआ ॥३॥(1237)॥

88. जिनसि थापि जीआं कउ भेजै जिनसि थापि लै जावै

जिनसि थापि जीआं कउ भेजै जिनसि थापि लै जावै ॥
आपे थापि उथापै आपे एते वेस करावै ॥
जेते जीअ फिरहि अउधूती आपे भिखिआ पावै ॥
लेखै बोलणु लेखै चलणु काइतु कीचहि दावे ॥
मूलु मति परवाणा एहो नानकु आखि सुणाए ॥
करणी उपरि होइ तपावसु जे को कहै कहाए ॥२॥(1238)॥

89. जुड़ि जुड़ि विछुड़े विछुड़ि जुड़े

जुड़ि जुड़ि विछुड़े विछुड़ि जुड़े ॥
जीवि जीवि मुए मुए जीवे ॥
केतिआ के बाप केतिआ के बेटे केते गुर चेले हूए ॥
आगै पाछै गणत न आवै किआ जाती किआ हुणि हूए ॥
सभु करणा किरतु करि लिखीऐ करि करि करता करे करे ॥
मनमुखि मरीऐ गुरमुखि तरीऐ नानक नदरी नदरि करे ॥२॥(1238)॥

90. नानक तुलीअहि तोल जे जीउ पिछै पाईऐ

नानक तुलीअहि तोल जे जीउ पिछै पाईऐ ॥
इकसु न पुजहि बोल जे पूरे पूरा करि मिलै ॥
वडा आखणु भारा तोलु ॥
होर हउली मती हउले बोल ॥
धरती पाणी परबत भारु ॥
किउ कंडै तोलै सुनिआरु ॥
तोला मासा रतक पाइ ॥
नानक पुछिआ देइ पुजाइ ॥
मूरख अंधिआ अंधी धातु ॥
कहि कहि कहणु कहाइनि आपु ॥१॥(1239)॥

91. आखणि अउखा सुनणि अउखा आखि न जापी आखि

आखणि अउखा सुनणि अउखा आखि न जापी आखि ॥
इकि आखि आखहि सबदु भाखहि अरध उरध दिनु राति ॥
जे किहु होइ त किहु दिसै जापै रूपु न जाति ॥
सभि कारण करता करे घट अउघट घट थापि ॥
आखणि अउखा नानका आखि न जापै आखि ॥२॥
(1239)॥

92. जूठि न रागीं जूठि न वेदीं

जूठि न रागीं जूठि न वेदीं ॥
जूठि न चंद सूरज की भेदी ॥
जूठि न अंनी जूठि न नाई ॥
जूठि न मीहु वर्हिऐ सभ थाई ॥
जूठि न धरती जूठि न पाणी ॥
जूठि न पउणै माहि समाणी ॥
नानक निगुरिआ गुणु नाही कोइ ॥
मुहि फेरिऐ मुहु जूठा होइ ॥१॥1240)॥

93. नानक चुलीआ सुचीआ जे भरि जाणै कोइ

नानक चुलीआ सुचीआ जे भरि जाणै कोइ ॥
सुरते चुली गिआन की जोगी का जतु होइ ॥
ब्रहमण चुली संतोख की गिरही का सतु दानु ॥
राजे चुली निआव की पड़िआ सचु धिआनु ॥
पाणी चितु न धोपई मुखि पीतै तिख जाइ ॥
पाणी पिता जगत का फिरि पाणी सभु खाइ ॥२॥1240)॥

94. दुख विचि जमणु दुखि मरणु दुखि वरतणु संसारि

दुख विचि जमणु दुखि मरणु दुखि वरतणु संसारि ॥
दुखु दुखु अगै आखीऐ पड़्हि पड़्हि करहि पुकार ॥
दुख कीआ पंडा खुल्हीआ सुखु न निकलिओ कोइ ॥
दुख विचि जीउ जलाइआ दुखीआ चलिआ रोइ ॥
नानक सिफती रतिआ मनु तनु हरिआ होइ ॥
दुख कीआ अगी मारीअहि भी दुखु दारू होइ ॥१॥1240)॥

95. नानक दुनीआ भसु रंगु भसू हू भसु खेह

नानक दुनीआ भसु रंगु भसू हू भसु खेह ॥
भसो भसु कमावणी भी भसु भरीऐ देह ॥
जा जीउ विचहु कढीऐ भसू भरिआ जाइ ॥
अगै लेखै मंगिऐ होर दसूणी पाइ ॥२॥1240)॥

96. घरि नाराइणु सभा नालि

घरि नाराइणु सभा नालि ॥
पूज करे रखै नावालि ॥
कुंगू चंनणु फुल चड़ाए ॥
पैरी पै पै बहुतु मनाए ॥
माणूआ मंगि मंगि पैन्है खाइ ॥
अंधी कमी अंध सजाइ ॥
भुखिआ देइ न मरदिआ रखै ॥
अंधा झगड़ा अंधी सथै ॥१॥1240)॥

97. सभे सुरती जोग सभि सभे बेद पुराण

सभे सुरती जोग सभि सभे बेद पुराण ॥
सभे करणे तप सभि सभे गीत गिआन ॥
सभे बुधी सुधि सभि सभि तीरथ सभि थान ॥
सभि पातिसाहीआ अमर सभि सभि खुसीआ सभि खान ॥
सभे माणस देव सभि सभे जोग धिआन ॥
सभे पुरीआ खंड सभि सभे जीअ जहान ॥
हुकमि चलाए आपणै करमी वहै कलाम ॥
नानक सचा सचि नाइ सचु सभा दीबानु ॥२॥1241)॥

98. कलि होई कुते मुही खाजु होआ मुरदारु

कलि होई कुते मुही खाजु होआ मुरदारु ॥
कूड़ु बोलि बोलि भउकणा चूका धरमु बीचारु ॥
जिन जीवंदिआ पति नही मुइआ मंदी सोइ ॥
लिखिआ होवै नानका करता करे सु होइ ॥१॥(1242)॥

99. रंना होईआ बोधीआ पुरस होए सईआद

रंना होईआ बोधीआ पुरस होए सईआद ॥
सीलु संजमु सुच भंनी खाणा खाजु अहाजु ॥
सरमु गइआ घरि आपणै पति उठि चली नालि ॥
नानक सचा एकु है अउरु न सचा भालि ॥२॥(1243)॥

100. ध्रिगु तिना का जीविआ जि लिखि लिखि वेचहि नाउ

ध्रिगु तिना का जीविआ जि लिखि लिखि वेचहि नाउ ॥
खेती जिन की उजड़ै खलवाड़े किआ थाउ ॥
सचै सरमै बाहरे अगै लहहि न दादि ॥
अकलि एह न आखीऐ अकलि गवाईऐ बादि ॥
अकली साहिबु सेवीऐ अकली पाईऐ मानु ॥
अकली पड़्हि कै बुझीऐ अकली कीचै दानु ॥
नानकु आखै राहु एहु होरि गलां सैतानु ॥१॥(1245)॥

101. गिआन विहूणा गावै गीत

गिआन विहूणा गावै गीत ॥
भुखे मुलां घरे मसीति ॥
मखटू होइ कै कंन पड़ाए ॥
फकरु करे होरु जाति गवाए ॥
गुरु पीरु सदाए मंगण जाइ ॥
ता कै मूलि न लगीऐ पाइ ॥
घालि खाइ किछु हथहु देइ ॥
नानक राहु पछाणहि सेइ ॥१॥(1245)॥

102. मनहु जि अंधे कूप कहिआ बिरदु न जाणन्ही

मनहु जि अंधे कूप कहिआ बिरदु न जाणन्ही ॥
मनि अंधै ऊंधै कवलि दिसन्हि खरे करूप ॥
इकि कहि जाणहि कहिआ बुझहि ते नर सुघड़ सरूप ॥
इकना नाद न बेद न गीअ रसु रस कस न जाणंति ॥
इकना सुधि न बुधि न अकलि सर अखर का भेउ न लहंति ॥
नानक से नर असलि खर जि बिनु गुण गरबु करंति ॥२॥(1246)॥

103. नानक सावणि जे वसै चहु ओमाहा होइ

नानक सावणि जे वसै चहु ओमाहा होइ ॥
नागां मिरगां मछीआं रसीआं घरि धनु होइ ॥१॥
मः १ ॥
नानक सावणि जे वसै चहु वेछोड़ा होइ ॥
गाई पुता निरधना पंथी चाकरु होइ ॥२॥(1279)॥

104. लख मण सुइना लख मण रुपा लख साहा सिरि साह

लख मण सुइना लख मण रुपा लख साहा सिरि साह ॥
लख लसकर लख वाजे नेजे लखी घोड़ी पातिसाह ॥
जिथै साइरु लंघणा अगनि पाणी असगाह ॥
कंधी दिसि न आवई धाही पवै कहाह ॥
नानक ओथै जाणीअहि साह केई पातिसाह ॥४॥(1287)॥

105. हरणां बाजां तै सिकदारां एन्हा पड़्हिआ नाउ

हरणां बाजां तै सिकदारां एन्हा पड़्हिआ नाउ ॥
फांधी लगी जाति फहाइनि अगै नाही थाउ ॥
सो पड़िआ सो पंडितु बीना जिन्ही कमाणा नाउ ॥
पहिलो दे जड़ अंदरि जमै ता उपरि होवै छांउ ॥
राजे सीह मुकदम कुते ॥
जाइ जगाइन्हि बैठे सुते ॥
चाकर नहदा पाइन्हि घाउ ॥
रतु पितु कुतिहो चटि जाहु ॥
जिथै जीआं होसी सार ॥
नकीं वढीं लाइतबार ॥२॥(1288)॥

106. पहिलां मासहु निमिआ मासै अंदरि वासु

पहिलां मासहु निमिआ मासै अंदरि वासु ॥
जीउ पाइ मासु मुहि मिलिआ हडु चमु तनु मासु ॥
मासहु बाहरि कढिआ ममा मासु गिरासु ॥
मुहु मासै का जीभ मासै की मासै अंदरि सासु ॥
वडा होआ वीआहिआ घरि लै आइआ मासु ॥
मासहु ही मासु ऊपजै मासहु सभो साकु ॥
सतिगुरि मिलिऐ हुकमु बुझीऐ तां को आवै रासि ॥
आपि छुटे नह छूटीऐ नानक बचनि बिणासु ॥१॥(1289)॥

107. मासु मासु करि मूरखु झगड़े गिआनु धिआनु नही जाणै

मासु मासु करि मूरखु झगड़े गिआनु धिआनु नही जाणै ॥
कउणु मासु कउणु सागु कहावै किसु महि पाप समाणे ॥
गैंडा मारि होम जग कीए देवतिआ की बाणे ॥
मासु छोडि बैसि नकु पकड़हि राती माणस खाणे ॥
फड़ु करि लोकां नो दिखलावहि गिआनु धिआनु नही सूझै ॥
नानक अंधे सिउ किआ कहीऐ कहै न कहिआ बूझै ॥
अंधा सोइ जि अंधु कमावै तिसु रिदै सि लोचन नाही ॥
मात पिता की रकतु निपंने मछी मासु न खांही ॥
इसत्री पुरखै जां निसि मेला ओथै मंधु कमाही ॥
मासहु निमे मासहु जमे हम मासै के भांडे ॥
गिआनु धिआनु कछु सूझै नाही चतुरु कहावै पांडे ॥
बाहर का मासु मंदा सुआमी घर का मासु चंगेरा ॥
जीअ जंत सभि मासहु होए जीइ लइआ वासेरा ॥
अभखु भखहि भखु तजि छोडहि अंधु गुरू जिन केरा ॥
मासहु निमे मासहु जमे हम मासै के भांडे ॥
गिआनु धिआनु कछु सूझै नाही चतुरु कहावै पांडे ॥
मासु पुराणी मासु कतेबीं चहु जुगि मासु कमाणा ॥
जजि काजि वीआहि सुहावै ओथै मासु समाणा ॥
इसत्री पुरख निपजहि मासहु पातिसाह सुलतानां ॥
जे ओइ दिसहि नरकि जांदे तां उन्ह का दानु न लैणा ॥
देंदा नरकि सुरगि लैदे देखहु एहु धिङाणा ॥
आपि न बूझै लोक बुझाए पांडे खरा सिआणा ॥
पांडे तू जाणै ही नाही किथहु मासु उपंना ॥
तोइअहु अंनु कमादु कपाहां तोइअहु त्रिभवणु गंना ॥
तोआ आखै हउ बहु बिधि हछा तोऐ बहुतु बिकारा ॥
एते रस छोडि होवै संनिआसी नानकु कहै विचारा ॥२॥(1289)॥

108. जउ तउ प्रेम खेलण का चाउ

जउ तउ प्रेम खेलण का चाउ ॥
सिरु धरि तली गली मेरी आउ ॥
इतु मारगि पैरु धरीजै ॥
सिरु दीजै काणि न कीजै ॥२०॥(1412)॥

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