Month: October 2015

रावण

“सीते, राघव की परिणीता हो लेकिन, जो सच है उसको तो कानों से सुन लो, जो अनुचित लगे निकालो अपने मन से, पर कुछ भी तथ्य लगे तो उसको …

आदमी बुलबुला है पानी का …

आदमी बुलबुला है पानी का और पानी की बहती सतह पर टूटता है डूबता भी है फिर उभरता है फिर से बहता है ना समंदर निगल सका है इसको न तवारीख तोड़ …

मधुशाला – हरिवंशराय बच्चन

  मृदु भावों के अंगूरों की आज बना लाया हाला, प्रियतम, अपने ही हाथों से आज पिलाऊँगा प्याला, पहले भोग लगा लूँ तेरा फिर प्रसाद जग पाएगा, सबसे पहले …

रूह देखी है ,कभी रूह को महसूस किया है ?

गुलजार का लेखन क्यूँ इतना दिल के करीब लगता है ..क्यूंकि वह आम भाषा में लिखा होता है ..रूह से लिखा हुआ ..उनकी लिखी एक नज्म कितना कुछ कह …

गुलज़ार की बेहतरीन नज़्में | Gulzar Poetry

  नज़्म उलझी हुई है सीने में मिसरे अटके हुए हैं होठों पर उड़ते-फिरते हैं तितलियों की तरह लफ़्ज़ काग़ज़ पे बैठते ही नहीं कब से बैठा हुआ हूँ …

तुम्हारे साथ पूरा एक दिन बस खर्च करने की तमन्ना है !

      जिंदगी की भागम भाग और रोजी रोटी की चिंता में न जाने कितने पल यूँ ही बीत जाते हैं …अपनों का साथ जब कम मिल पाता …