Hindi-Urdu Poetryअमज़द इस्लाम अमज़द

अमज़द इस्लाम अमज़द

1.
दरिया की हवा तेज़ थी, कश्ती थी पुरानी
रोका तो बहुत दिल ने मगर एक न मानी

मैं भीगती आँखों से उसे कैसे हटाऊ
मुश्किल है बहुत अब्र में दीवार उठानी

निकला था तुझे ढूंढ़ने इक हिज्र का तारा
फिर उसके ताआकुब में गयी सारी जवानी

कहने को नई बात हो तो सुनाए
सौ बार ज़माने ने सुनी है ये कहानी

किस तरह मुझे होता गुमा तर्के-वफ़ा का
आवाज़ में ठहराव था, लहजे में रवानी

अब मैं उसे कातिल कहूँ ‘अमज़द’ कि मसीहा
क्या ज़ख्मे-हुनर छोड़ गया अपनी निशानी

2.
तुम से बिछड़ कर पहरों सोचता रहता हूँ
अब में क्यूँ और किस की खातिर ज़िंदा हूँ

मेरी सोचें बदलती जा रही हैं
के यह चीजें बदलती जा रही हैं

तमाशा एक है रोज़-ए-अज़ल से
फ़क़त आँखें बदलती जा रही हैं

बदलते मंज़रों के आईने में
तेरी यादें बदलती जा रही हैं

दिलों से जोडती थी जो दिलों को
वोह सब रस्में बदलती जा रही हैं

न जाने क्यों मुझे लगता है अमजद
के वो नजरें बदलती जा रही हैं

3.

भीड़ में इक अजनबी का सामना अच्छा लगा
सब से छुपकर वो किसी का देखना अच्छा लगा

सुरमई आंखों के नीचे फूल से खिलने लगे
कहते कहते फिर किसी का सोचना अच्छा लगा

बात तो कुछ भी नहीं थी लेकिन उसका एकदम
हाथ को होंठों पे रख कर रोकना अच्छा लगा

चाय में चीनी मिलाना उस घड़ी भाया बहुत
जेर ए लब वो मुस्कुराता शुक्रिया अच्छा लगा

दिल में कितने अहद बंधे थे भुलाने के उसे
वो मिला तो सब इरादे तोड़ना अच्छा लगा

उस अदा ओ’ जान को ‘अमजद’ मैं बुरा कैसे कहूं
जब भी आया सामने वो बेवफा अच्छा लगा

4.
जब कोई जी ना सके मर जाये,
आपका नाम बेबस लेता है

कौन सुनता है किसी की विपदा
सब के माथे पे यही किस्सा है

कोई डरता है भरी महफिल में
कोई तन्हाई में हंस पड़ता है

यही जन्नत है यही दोजख है
और देखो तो, यही दुनिया है

सब की किस्मत में फना है जब तक
आसमानों पे कोई जिन्दा है

वो खुदा है तो जमीं पर आये
हश्र का दिन तो यहां बरपा है

सांस रोके हुए बैठे हैं अमजद
वक्त दुश्मन की तरह चलता है

5.
चेहरे पे मेरे जुल्फों को, फैलाओ किसी दिन
क्या रोज गरजते हो, बरस जाओ किसी दिन

राजों की तरह उतरो मेरे दिल में किसी शब
दस्तक पे मेरे हाथ की खुल जाओ किसी दिन

पेड़ों की तरह हुस्न की बारिश में नहा लूं
बादल की तरह झूम के घिर आओ किसी दिन

खुश्बू की तरह गुजरो मेरे दिल की गली से
फूलों की तरह मुझ पे बिखर जाओ किसी दिन

फिर हाथ को खैरात मिले बंद-ए-कबा की
फिर लुत्फ-ए-शब-ए-वस्ल को दोहराओ किसी दिन

गुजरें जो मेरे घर से तो रूक जायें सितारे
इस तरह मेरी रात को चमकाओ किसी दिन

मैं अपनी हर इक सांस उसी रात को दे दूं
सर रख के मेरे सीने पे सो जाओ किसी दिन

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