अख़्तर अंसारी

 (जन्म : ०१ अक्टूबर १९०९ ,बदायूँ ,पाकिस्तान)


1.
इत्तफ़ाक़ से रस्ते में मिल गया था मुझे
मैं देखता था उसे और वो देखता था मुझे

अगरचे उसकी नज़र में थी न आशनाई
मैं जानता हूँ कि बरसों से जानता था मुझे

तलाश कर न सका फिर मुझे वहाँ जाकर
ग़लत समझ के जहाँ उसने खो दिया था मुझे

बिखर चुका था अगर मैं, तो क्यों समेटा था
मैं पैरहन था शिकस्ता तो क्यों सिया था मुझे

है मेरा हर्फ़-ए-तमन्ना, तेरी नज़र का क़ुसूर
तेरी नज़र ने ही ये हौसला दिया था मुझे

2.
साफ़ ज़ाहिर है निगाहों से कि हम मरते हैं
मुँह से कहते हुए ये बात मगर डरते हैं

एक तस्वीर-ए-मुहब्बत है जवानी गोया
जिस में रंगो की एवज़ ख़ून-ए-जिगर भरते हैं

इशरत-ए-रफ़्ता ने जा कर न किया याद हमें
इशरत-ए-रफ़्ता को हम याद किया करते हैं

समां से कभी देखी न गई अपनी ख़ुशी
अब ये हालात हैं कि हम हँसते हुए डरते हैं

शेर कहते हो बहुत ख़ूब तुम “अख्तर”
लेकिन अच्छे शायर ये सुना है कि जवां मरते हैं

3.
सुनने वाले फ़साना तेरा है
सिर्फ़ तर्ज़-ए-बयाँ ही मेरा है

यास की तीरगी ने घेरा है
हर तरफ़ हौल-नाक अँधेरा है

इस में कोई मेरा शरीक नहीं
मेरा दुख आह सिर्फ़ मेरा है

चाँदनी चाँदनी नहीं ‘अख़्तर’
रात की गोद में सवेरा है

4. 

ग़म-ए-हयात कहानी है क़िस्सा-ख़्वाँ हूँ मैं
दिल-ए-सितम-ज़दा है राज़-दाँ हूँ मैं

ज़्यादा इस से कोई आज तक बता न सका
के एक नुक़्ता-ए-ना-क़ाबिल-ए-बयाँ हूँ मैं

नज़र के सामने कौंदी थी एक बिजली सी
मुझे बताओ ख़ुदारा के अब कहाँ हूँ मैं

ख़िज़ाँ ने लूट लिया गुलशन-ए-शबाब मगर
किसी बहार के अरमान में जवाँ हूँ मैं

ये कह रही है नज़र की ग़म-ए-आफ़रीं जुम्बिश
किसी के दिल की तबाही की दास्ताँ हूँ मैं

ख़िज़ाँ कहती थी मैं शोख़ी-ए-बहाराँ हूँ
बहार कहती है रंगीनी-ए-ख़िज़ाँ हूँ मैं

शबाब नाम है उस जाँ-नवाज़ लम्हे का
जब आदमी को ये महसूस हो जवाँ हूँ मैं

जहान-ए-दर्द-ओ-अलम पूजता है मुझ को आह
तपिश-ए-जबीं है लहू सजदा आस्ताँ हूँ मैं

वो दिन भी थे के मैं जान-ए-शबाब था ‘अख़्तर’
अब अपने अहद-ए-जवानी की दास्ताँ हूँ मैं

5. 

आईना-ए-निगाह में अक्स-ए-शबाब है
दुनिया समझ रही है के आँखों में ख़्वाब है

रोए बग़ैर चारा न रोने की ताब है
क्या चीज़ उफ़ ये कैफ़ियत-ए-इज़्तिराब है

ऐ सोज़-ए-जाँ-गुदाज़ अभी मैं जवान हूँ
ऐ दर्द-ए-ला-इलाज ये उम्र-ए-शबाब है

6. 

मोहब्बत करने वालों के बहार-अफ़रोज़ सीनों में
रहा करती है शादाबी ख़ज़ाँ के भी महीनों में

ज़िया-ए-महर आँखों में है तौबा मह-जबीनों में
के फ़ितरत ने भरा है हुस्न ख़ुद अपना हसीनों में

हवा-ए-तुंद है गर्दाब है पुर-शोर धारा है
लिए जाते हैं ज़ौक-ए-आफ़ियत सी शय सफीनों में

मैं हँसता हूँ मगर ऐ दोस्त अक्सर हँसते हुए भी
छुपाए होते हैं दाग़ और नासूर अपने सीनों में

मैं उन में हूँ जो हो कर आस्ताँ-ए-दोस्त से महरूम
लिए फिरते हैं सजदों की तड़प अपनी जबीनों में

मेरी ग़ज़लें पढ़ें सब अहल-ए-दिल और मस्त हो जाएँ
मय-ए-जज़्बात लाया हूँ मैं लफ़्ज़ी आब-गीनों में

7. 

समझता हूँ मैं सब कुछ सिर्फ़ समझाना नहीं आता
तड़पता हूँ मगर औरों को तड़पाना नहीं आता

ये जमुना की हसीं अमवाज क्यूँ अर्गन बजाती हैं
मुझे गाना नहीं आता मुझे गाना नहीं आता

ये मेरी ज़ीस्त ख़ुद इक मुस्तक़िल तूफ़ान है ‘अख़्तर’
मुझे इन ग़म के तूफ़ानों से घबराना नहीं आता

8. 

दिल के अरमान दिल को छोड़ गए
आह मुँह इस जहाँ से मोड़ गए

वो उमंगें नहीं तबीअत में
क्या कहें जी को सदमे तोड़ गए

बाद-ए-बास के मुसलसल दौर
साग़र-ए-आरज़ू फोड़ गए

मिट गए वो नज़्ज़ारा-हा-ए-जमील
लेकिन आँखों में अक्स छोड़ गए

हम थे इशरत की गहरी नींदें थीं
आए आलाम और झिंझोड़ गए

9. 

आफ़तों में घिर गया हूँ ज़ीस्त से बे-ज़ार हूँ
मैं किसी रूमान-ए-ग़म का मरकज़ी किरदार हूँ

मुद्दतों खेली हैं मुझ से ग़म की बे-दर्द उँगलियाँ
मैं रुबाब-ए-ज़िन्दगी का इक शिकस्ता तार हूँ

दूसरों का दर्द ‘अख़्तर’ मेरे दिल का दर्द है
मुबतला-ए-ग़म है दुनिया और मैं ग़म-ख़्वार हूँ

10. 

अपनी उजड़ी हुई दुनिया की कहानी हूँ मैं
एक बिगड़ी हुई तस्वीर-ए-जवानी हूँ मैं

आग बन कर जो कभी दिल में निहाँ रहता था
आज दुनिया में उसी ग़म की निशानी हूँ मैं

हाए क्या क़हर है मरहूम जवानी की याद
दिल से कहती है के ख़ंजर की रवानी हूँ मैं

आलम-अफ़रोज़ तपिश तेरे लिए लाया हूँ
ऐ ग़म-ए-इश्क़ तेरा अहद-ए-जवानी हूँ मैं

चर्ख़ है नग़मा-गर अय्याम हैं नग़मे ‘अख़्तर’
दास्ताँ-गो है ग़म-ए-दहर कहानी हूँ मैं.

11. 

सरशार हूँ छलकते हुए जाम की क़सम
मस्त-ए-शराब-ए-शौक़ हूँ ख़य्याम की क़सम

इशरत-फ़रोश था मेरा गुज़रा हुआ शबाब
कहता हूँ खा के इशरत-ए-अय्याम की क़सम

होती थी सुब्ह-ए-ईद मेरी सुब्ह पर निसार
खाती थी शाम-ए-ऐश मेरी शाम की क़सम

‘अख़्तर’ मज़ाक़-ए-दर्द का मारा हुआ हूँ मैं
खाते हैं अहल-ए-दर्द मेरे नाम की क़सम

12. 

आरज़ू को रूह में ग़म बन के रहना आ गया
सहते सहते हम को आख़िर रंज सहना आ गया

दिल का ख़ूँ आँखों में खिंच आया चलो अच्छा हुआ
मेरी आँखों को मेरा अहवाल कहना आ गया

सहल हो जाएगी मुश्किल ज़ब्त सोज़ ओ साज़ की
ख़ून-ए-दिल को आँख से जिस रोज़ बहना आ गया

मैं किसी से अपने दिल की बात कह सकता न था
अब सुख़न की आड़ में क्या कुछ न कहना आ गया

जब से मुँह को लग गई ‘अख्तर’ मोहब्बत की शराब
बे-पिए आठों पहर मद-होश रहना आ गया

13. 

ख़्वाहिश-ए-ऐश नहीं दर्द-ए-निहानी की क़सम
बुल-हवस खाया करें इशरत-ए-फ़ानी की क़सम

इक ग़म-अंगेज़ हक़ीक़त है हमारी हस्ती
क़िस्सा-ख़्वाँ तेरी ग़म-अंगेज़ कहानी की क़सम

दिल की गहराइयों में आग दबी रखता हूँ
चश्म-ए-गिर्यां से बरसते हुए पानी की क़सम

जब से आई है ख़ुदा रक्खे जवानी ‘अख़्तर’
हम हर इक बात पर खाते हैं जावानी की क़सम

14. 

क़सम इन आँखों की जिन से लहू टपकता है
मेरे जिगर में इक आतिश-कदा दहकता है

गुज़िश्ता काहिश ओ अंदोह के ख़याल ठहर
मेरे दिमाग़ में शोला सा इक भड़कता है

किसी के ऐश-ए-तमन्ना की दास्ताँ न कहो
कलेजा मेरी तमन्नाओं का धड़कता है

इलाज-ए-‘अख़्तर’-ए-ना-काम क्यूँ नहीं मुमकिन
अगर वो जी नहीं सकता तो मर तो सकता है.

15. 

चीर कर सीने को रख दे गर न पाए ग़म-गुसार
दिल की बातें दिल ही से कोई यहाँ कब तक करे

मुबतला-ए-दर्द होने की ये लज़्ज़त देखिये
क़िस्सा-ए-ग़म हो किसी का दिल मेरा धक धक करे

सब की क़िस्मत इक न इक दिन जागती है हाँ बजा
ज़िंदगी क्यूँ कर गुज़ारे वो जो इस में शक करे

16. 

फूल सूँघे जाने क्या याद आ गया
दिल अजब अंदाज़ से लहरा गया

उस से पूछे कोई चाहत के मज़े
जिस ने चाहा और जो चाहा गया

एक लम्हा बन के ऐश-ए-जावेदाँ
मेरी सारी ज़िंदगी पर छा गया

ग़ुँचा-ए-दिल है कैसा ग़ुँचा था
जो खिला और खिलते ही मुरझा गया

रो रहा हूँ मौसम-ए-गुल देख कर
मैं समझता था मुझे सब्र आ गया

ये हवा ये बर्ग-ए-गुल का एहतिज़ाज़
आज मैं राज़-ए-मुसर्रत पा गया

‘अख़्तर’ अब बरसात रुख़्सत हो गई
अब हमारा रात का रोना गया
17. 

मैं दिल को चीर के रख दूँ ये एक सूरत है
बयाँ तो हो नहीं सकती जो अपनी हालत है

मेरे सफ़ीने को धारे पे डाल दे कोई
मैं डूब जाऊँ के तैर जाऊँ मेरी क़िस्मत है

रगों में दौड़ती हैं बिजलियाँ लहू के एवज़
शबाब कहते हैं जिस चीज़ को क़यामत है

लताफ़तें सिमट आती हैं ख़ुल्द की दिल में
तसव्वुरात में अल्लाह कितनी क़ुदरत है

18.
दिल-ए-फ़सुर्दा में कुछ सोज़ ओ साज़ बाक़ी है

वो आग बुझ गई लेकिन गुदाज़ बाक़ी है

नियाज़-केश भी मेरी तरह न हो कोई
उमीद मर चुकी ज़ौक-ए-नियाज़ बाक़ी है

वो इब्तिदा है मोहब्बत की लज्ज़तें वल्लाह
के अब भी रूह में इक एहतराज़ बाक़ी है

न साज़-ए-दिल है अब ‘अख़्तर’ न हुस्न की मिज़राब
मगर वो फ़ितरत-ए-नग़मा-नवाज़ बाक़ी

19.
मोहब्बत है अज़ीयत है हुजूम-ए-यास-ओ-हसरत है
जवानी और इतनी दुख भरी कैसी क़यामत है

वो माज़ी जो है इक मजमुआ अश्कों और आहों का
न जाने मुझ को इस माज़ी से क्यूँ इतनी मोहब्बत है

लब-ए-दरिया मुझे लहरों से यूँही चहल करने दो
के अब दिल को इसी इक शुग़्ल-ए-बे-मानी में राहत है

तेरा अफ़साना ऐ अफ़साना-ख़्वाँ रंगीं सही मुमकिन
मुझे रूदाद-ए-इशरत सुन के रो देने की आदत है

कोई रोए तो मैं बे-वजह ख़ुद भी रोने लगता हूँ
अब ‘अख़्तर’ चाहे तुम कुछ भी कहो ये मेरी फ़ितरत है

20. 

अब वो सीना है मज़ार-ए-आरज़ू
था जो इक दिन शोला-ज़ार-ए-आरज़ू.

अब तक आँखों से टपकता है लहू
बुझ गया था दिल में ख़ार-ए-आरज़ू.

रंग ओ बू में डूबे रहते थे हवास
हाए क्या शय थी बहार-ए-आरज़ू.

21. 

दिन मुरादों के ऐश की रातें
हाए क्या हो गईं वो बरसातें

रात को बाग़ में मुलाक़ातें
याद हैं जैसे ख़्वाब की बातें

हसरतें सर्द आहें गर्म आँसू
लाई है बर्शगाल सौग़ातें

ख़्वार हैं यूँ मेरे शबाब के दिन
जैसे जाड़ों की चाँदनी रातें

दिल ये कहता है कुंज-ए-राहत हूँ
देखना ग़म-नसीब की बातें

जिन के दम से शबाब था ज़िंदा
है ‘अख़्तर’ वो इश्क़ की घातें

 

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